Gurugram News: गुरुग्राम आज कॉरपोरेट दफ्तरों, IT कंपनियों, लग्जरी अपार्टमेंट और तेज रफ्तार कारोबार का प्रतीक है। लेकिन हर मानसून में यही साइबर सिटी एक अलग तस्वीर पेश करती है सड़कों पर पानी, घंटों जाम, बंद अंडरपास और परेशान लाखों लोग। सवाल यह है कि जिस शहर ने आर्थिक विकास में इतनी तेज छलांग लगाई, उसकी जल-निकासी और बुनियादी शहरी योजना पीछे क्यों रह गई? गुरुग्राम के बदलने की कहानी महाभारत से जुड़ी मान्यता के अनुसार यह क्षेत्र गुरु द्रोणाचार्य से जुड़ा था, इसलिए इसे गुरुग्राम यानी ‘गुरु का ग्राम’ कहा गया। कभी यह खेती, गांवों और खुली जमीन वाला इलाका था। हरियाणा के गठन, NCR से निकटता और 1990 के बाद आर्थिक उदारीकरण ने इसकी दिशा बदल दी। दिल्ली के पास उपलब्ध जमीन ने निजी डेवलपर्स, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और रियल एस्टेट निवेशकों को आकर्षित किया। कॉरपोरेट हब बना गुरुग्राम धीरे-धीरे यहां ऊंची इमारतें, मॉल, होटल, कॉरपोरेट पार्क और आवासीय टाउनशिप खड़ी होती चली गईं। साइबर सिटी, गोल्फ कोर्स रोड, एमजी रोड और सोहना रोड जैसे इलाके देश के प्रमुख व्यावसायिक कॉरिडोर बन गए। आज गुरुग्राम में 250 से अधिक फॉर्च्यून कंपनियों के कार्यालय और कई बड़े कॉरपोरेट मुख्यालय मौजूद हैं। निवेश का सबसे बड़ा ठिकाना आर्थिक आंकड़े भी इसकी ताकत बताते हैं। हरियाणा के कुल एक्साइज और जीएसटी राजस्व में गुरुग्राम की हिस्सेदारी करीब 35 से 40 प्रतिशत बताई जाती है। राज्य में होने वाले वार्षिक निवेश का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा भी इसी जिले में आता है। NCR के ऑफिस मार्केट में गुरुग्राम की हिस्सेदारी लगभग 60 प्रतिशत है, जबकि 2025 के ऑफिस ट्रांजैक्शन में इसका योगदान करीब 61 प्रतिशत रहा। जुलाई 2026 तक यहां का कुल ऑफिस स्पेस 10 करोड़ वर्ग फुट के पार पहुंच चुका था। बारिश में बेनकाब सिस्टम फिर भी, कुछ घंटों की तेज बारिश इस आर्थिक ताकत की कमजोर बुनियाद उजागर कर देती है। कई प्रमुख सड़कें और अंडरपास जलमग्न हो जाते हैं, वाहन घंटों फंसे रहते हैं और ऑफिस पहुंचने वाले कर्मचारी परेशान होते हैं। गर्मियों में पानी की कमी और मानसून में जलभराव दोनों समस्याएं शहर की जल-योजना पर गंभीर सवाल उठाती हैं। शहरी विस्तार पर सवाल टाउन प्लानर ऋषिदेव के अनुसार, गुरुग्राम की परेशानी को सिर्फ नालों की सफाई या ड्रेनेज क्षमता की कमी से नहीं समझा जा सकता। असली मुद्दा यह है कि शहर का विस्तार प्राकृतिक जल-प्रवाह, तालाबों, जलाशयों और स्थानीय भूगोल को पर्याप्त महत्व दिए बिना हुआ। बारिश को हर साल आने वाली प्राकृतिक प्रक्रिया मानने के बजाय अक्सर उसे अचानक पैदा हुई आपदा की तरह देखा जाता है। ड्रेनेज सिस्टम की खामी उनका मानना है कि नक्शे तैयार करना और वास्तविक अर्बन प्लानिंग करना अलग बातें हैं। प्रभावी शहरी योजना में आबादी का घनत्व, सीवरेज, वर्षा जल, सड़कें, पर्यावरण और प्राकृतिक जल-प्रणाली को एक साथ जोड़कर देखना जरूरी है। कई इलाकों में सीवरेज और वर्षा जल निकासी का मिश्रित ढांचा जलभराव तथा क्लॉगिंग की समस्या बढ़ा देता है। स्मार्ट सिटी की असली परीक्षा समाधान केवल बड़े फ्लाईओवर या नई ड्रेनेज लाइनें बनाने में नहीं है। शहर को वेटलैंड, प्राकृतिक जलमार्ग, वर्षा जल संचयन और स्थानीय स्तर पर सीवरेज ट्रीटमेंट के साथ विकसित करना होगा। गुरुग्राम के सामने चुनौती साफ है- क्या विकास केवल कांच की इमारतों से मापा जाएगा, या ऐसा शहर बनाया जाएगा जो बारिश के साथ भी सामान्य रूप से चल सके? ये भी पढ़ें: स्वाइन फ्लू ने बढ़ाई चिंता, उत्तराखंड में 49 मामले, 5 की मौत